भारत की संस्कृति के लिए... भाषा की उन्नति के लिए... साहित्य के प्रसार के लिए
लोक संगीत
कविता कोश विशेष क्यों है?
कविता कोश परिवार

ख़ुद से ही डरने लगे हैं अब तो अक्सर सोचकर / विनय मिश्र

Kavita Kosh से
अनिल जनविजय (चर्चा | योगदान) द्वारा परिवर्तित 22:17, 25 फ़रवरी 2011 का अवतरण (नया पृष्ठ: {{KKGlobal}} {{KKRachna |रचनाकार=विनय मिश्र }} {{KKCatGhazal}} <poem> ख़ुद से ही डरने लगे हैं अब …)

(अंतर) ← पुराना अवतरण | वर्तमान अवतरण (अंतर) | नया अवतरण → (अंतर)
यहाँ जाएँ: भ्रमण, खोज

ख़ुद से ही डरने लगे हैं अब तो अक्सर सोचकर ।
हाथ में रखने लगे हैं लोग पत्थर सोचकर।

हर तरफ़ ठहरी हुई-सी ज़िंदगी है जब यहाँ
सोचता हूँ कुछ बदल जाना है बेहतर सोचकर ।

अब चढ़ावों पर टिकी हैं आस्थाएँ देखिए
हँस पड़ा पूजा के मंदिर को मैं दफ़्तर सोचकर ।

इसमें दुनिया भर की चीज़ें आ गईं बाज़ार की
आज तक रहता रहा हूँ मैं जिसे घर सोचकर ।

मैं उतरता आ रहा हूँ जल-प्रपातों की तरह
एक दिन पाऊँगा मैं भी इक समंदर सोचकर ।

यूँ तो बाहर मुस्कराती हैं बहुत लाचारियाँ
काँप जाता हूँ मगर मैं इनके भीतर सोचकर ।

भागते पहियों पे साँसों के कहा, जो भी कहा
इस हुनर के साथ लेकिन कुछ ठहरकर सोचकर ।