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खाय आदमी-आदमी अचरज के ई बात / अश्विनी कुमार ‘आँसू’

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खाय आदमी-आदमी अचरज के ई बात।
माँस खवक्कड़ काग जे ऊहो काग ना खात।।

ओछन का मुँह जे लगे, अपने जात नसाय।
सनकी पुरवा संग लगि, बदरा गइल बिलाय।।

कजरा बहि बदरा भइल, तैरत फिरे अकास।
पिय के पता ना पाइ के, बरसे होइ निरास।।

गइल जवानी ना मिले, घीव-मलीदा खाय।
उतरल पानी ना चढ़े, लाख-करोड़ चुकाय।।

पिय के आवन जानि के, मिटत हिया के पीर।
दरस, परस लागे दवा, छूटे रोग गंभीर।।

सुगना सगुन उचारि के, कागा भेज सनेस।
सावन बरसे आग री, पिया बसे परदेस।।

हरन-मरन में जग कहे, मन में राखऽ धीर।
बाँझ भला का जानिहें, परसोता के पीर।।

ताना मारे गोतिनी, कसे परोसिन बोल।
एके गो तोहरे बिना, पिय हम फूटल ढोल।।

अँसुअन शीत न होइहें, बिरहानल के ताप।
मिलन-मरन दू राह से, छूटत ई संताप।।

जीयत जान न छोड़िहें, बेरहमी यमराज।
तबहूँ मनवाँ चेत ना, हरि गुन करे अकाज।।