भारत की संस्कृति के लिए... भाषा की उन्नति के लिए... साहित्य के प्रसार के लिए
लोक संगीत
कविता कोश विशेष क्यों है?
कविता कोश परिवार

खिली सुनहरी सुबह / निर्मल शुक्ल

Kavita Kosh से
अनिल जनविजय (चर्चा | योगदान) द्वारा परिवर्तित 19:25, 9 फ़रवरी 2011 का अवतरण (नया पृष्ठ: {{KKGlobal}} {{KKRachna |रचनाकार=निर्मल शुक्ल |संग्रह= }} {{KKCatNavgeet}} <poem> '''यह गीत अधूरा ह…)

(अंतर) ← पुराना अवतरण | वर्तमान अवतरण (अंतर) | नया अवतरण → (अंतर)
यहाँ जाएँ: भ्रमण, खोज

यह गीत अधूरा है, आपके पास हो तो कृपया आप इसे पूरा कर दें

खिली सुनहरी
सुबह ग्रीष्म की
बिखरे दाने धूप के।

कंचन पीकर मचले बेसुध,
अमलतास के गात।
ओस हो गई पानी-पानी,
जब तक समझे बात।

रही बाँचती कुल अभियोजन,
अनजाने प्रारूप के ।