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गंगा छवि / प्रदीप प्रभात

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गंगा किनारो पर
पंकज रोॅ घोॅर
जबेॅ-जबेॅ इम्मेॅ जाय छियै
तुरंत पिलावै छै
कॉफी आ कि चाय।
मेहमान रोॅ खातिरदारी करै लेॅ
खुब्बेॅ जानै छै।
की हुनकोॅ अद्भूत स्वभाव छै
की हुनकोॅ भाग्य छै।
जे नितदिन देखतेॅ रहै छै
भोरै उठी ऑख मलतेॅ हुवेॅ
गंगा रोॅ दृश्य
आरों पूरब दिशा के लाल रत-रत लालिमा
जबेॅ सुरूज क्षितिज सेॅ निहारैं छै
गंगा नद्दी रोॅ धारा केॅ
तेॅ गगा रोॅ पानी चानी नांखी
चकमक देखाय छै
पानी झल-मल करै छै
लागै ऐन्होॅ छै
माय गंगा खल-खल
हाँसी रहली छै।
अद्भूत दृश्य, मनमोहक वातावरण
मन करै छै-
पंकज रोॅ छतोॅ पर बैठी केॅ
नितदिन साझें-बिछलें निहार तेॅ रहीं
गंगा नद्दी रोॅ धारा केॅ।
जोॅ-जोॅ सुरूज ऊपर चढै छै
तोॅ-तोॅ पानी रोॅ तरंगे
वैन्हेॅ देखाय पड़ेॅ छै
जेना जौहौरी नेॅ चानी केॅ
गलैतेॅ रहेॅ।
यै तरह के रंग-विरंग रोॅ दृश्य देखी
मोॅन हर्षित होय जाय छै
सुरूज रोॅ किरिण
पानी मेॅ लहरावै छै
जेना लागै छै
आजादी रोॅ झण्डा लहरै छै।
नद्दी रोॅ दृश्य देखी
मोॅन खुब्बेॅ लागै छै।
गंगा नद्दी रोॅ धारा मेॅ
पानी रोॅ ऐंगना मेॅ।
चलै छै नाव, जहाज आरो
ढेरी सभी डेंगी।
जबेॅ भगवान भाष्कर
अस्ताचल रोॅ ओर जाय छै
जेना लागै छै
हँसतें हुवेॅ भगवान भाष्कर
आर्शीवाद दै रोॅ मुद्रा मेॅ
दोसरोॅ दिनोॅ रोॅ आशा दै केॅ
नया जीवन, नयका रोशनी
नवका कविता, नबका कहानी
नैका सौन्दर्य, नैका आभा आरो
लामा-लामा मूरत बनावै रोॅ वादा देतेॅ हुवेॅ
क्षितिज मेॅ घुसी जाय छै?
गंगा रोॅ धारा झरम मरम करते
भगवान भाष्कर रॉे साथ
एक देवर्षि जंगा
आँख बंद करि केॅ
तपस्या मेॅ लीन होय जाय छै।