भारत की संस्कृति के लिए... भाषा की उन्नति के लिए... साहित्य के प्रसार के लिए

गन्ध / बुद्धिलाल पाल

Kavita Kosh से
अनिल जनविजय (चर्चा | योगदान) द्वारा परिवर्तित 11:27, 26 मार्च 2009 का अवतरण (नया पृष्ठ: {{KKGlobal}} {{KKRachna |रचनाकार=बुद्धिलाल पाल |संग्रह= }} <Poem> आकाश को जब होती प्रसव...)

(अंतर) ← पुराना अवतरण | वर्तमान अवतरण (अंतर) | नया अवतरण → (अंतर)
यहाँ जाएँ: भ्रमण, खोज

आकाश को
जब होती
प्रसव-वेदना
लुढ़क कर
आ जाता है

ज़मीन पर
कुछ फूलों को
जन्म देता है
आकाश

हो जाता है
हल्का
कुछ समय
के लिए

आकाश तो आकाश होता है
पहुँच से बाहर
आकाश में फूलों का होना
नहीं रखता है
कोई मायने

ख़ुशबू बिखरने के लिए
चाहिए
मिट्टी-हवा-पानी
तब एक सोंधी गन्ध
अनुभव की जा सकती है
फूलों की