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ग़मों को भूल जाना आ गया है / सिया सचदेव

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ग़मों को भूल जाना आ गया है
हमें भी मुस्कुराना आ गया है
 
कोई काँटों से जाकर आज कह दे
हमें दामन बचाना आ गया है
 
लहू इंसान का है आज पानी
अरे कैसा ज़माना आ गया है
 
मैं हूँ दुःख दर्द में शामिल सभी के
मुझे अपना बनाना आ गया है
 
उतारो कब्र में अब मेरे यारो
के अब मेरा ठिकाना आ गया है
 
ज़मीर अपना गँवा कर आदमी को
फ़क़त पैसा कमाना आ गया है
 
कोई उनसे सिया बस इतना कह दे
की मौसम अब सुहाना आ गया है