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गाँव / कविता भट्ट

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1
पीपल मौन
पनघट सिसके
सुध ले कौन?
2
ना ही बतियाँ
रोती है गगरिया,
क्या डगरिया।
3
हँसी छिटकी
चौपाल यों सिसकी
विदा कन्या-सी
4
गाँव से रास्ते
माना जाने के लाखों
लौटे न कभी
5
खाली गौशाला
नाचे-झूमे खामोशी
ओढ़े दुशाला ।
6
गाँव यों रोए-
पगडण्डी रुआँसी
शाम धुआँ -सी
7
विरहन- से
गाँव हैं अब सारे
राह निहारे ।
8
आँखें भी मौन
ग्राम -बालिका वधू
सुध ले कौन ।
9
बूढ़ी चौपाल
तोड़ रही है दम
कोई न प्यार
10
जीर्ण हैं द्वार
पहाड़ी घर के तो,
न मनुहार ।

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