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गीत 2 / तेरहवां अध्याय / अंगिका गीत गीता / विजेता मुद्‍गलपुरी

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हे अर्जुन क्षेत्रज्ञ हम्हीं छी
सब विकार से रहित प्रकृति हम, पावन प्रज्ञ हम्हीं छी।

सुनोॅ, क्षेत्र जौने जैसन छै, जे विकार वाला छै
जे कारण से जुरल होल छै, जे प्रभाव वाला छै
से सब कुछ संक्षेप में कहवोॅ, व्यापक-विज्ञ हम्हीं छी
हे अर्जुन क्षेत्रज्ञ हम्हीं छी।

क्षेत्र और क्षेत्रज्ञ तत्त्व के बहुविधि ऋषिगण गैलन
विविध वेद मंत्रों मंे जेकरा विविध विभाग बतैलन
ब्रह्म-सूत्र जे उक्ति बतैलक से मर्मज्ञ हम्हीं छी
हे अर्जुन क्षेत्रज्ञ हम्हीं छी।

हे अर्जुन, हम मूल प्रकृति छी, सब से पहिने जानोॅ
जानोॅ, पाँचो महाभूत, चित-अहंकार छी मानोॅ
दस इन्द्रिय, मन, विषय अंग के, अन्तः यग हम्हीं छी
हे अर्जुन क्षेत्रज्ञ हम्हीं छी।