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गीत 6 / पाँचवाँ अध्याय / अंगिका गीत गीता / विजेता मुद्‍गलपुरी

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परमेश्वर नै पाप कर्म, नै पुण्य कर्म के ग्रहण करै
सब मनुष्य अपनोॅ कर्मो से पुण्य वृद्धि या क्षरण करै।

तत्त्व-ज्ञान जिनका हिय के
अज्ञान तत्त्व सब नासै,
ज्ञान सूर्य सम चिदानन्द-घन
आतम तत्त्व प्रकाशै,
मन-बुद्धि तद्रूप करी केॅ परमेश्वर के वरण करै
परमेश्वर नै पाप कर्म, नै पुण्य कर्म के ग्रहण करै।

जिनकर एकीभाव निरन्तर
परमेश्वर में वासै,
ऐसन ज्ञानी तत्त्व परायण
सकल अविद्या नासै,
सहज परम गति पावै नाम सुमरि जे शुभ आचरण करै
परमेश्वर नै पाप कर्म, नै पुण्य कर्म के ग्रहण करै।

मनन करै सच्चिदानन्द-घन के
से मुनि कहलावै,
पावै जे सच्चिदानन्द के
से तद्रूप कहावै,
पावै एकाकार भाव के, जे विकार सब क्षरण करै
परमेश्वर नै पाप कर्म, नै पुण्य कर्म के ग्रहण करै।