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गोपू का कीड़ा / चिन्तामणि जोशी

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गाँव में पैदा हुआ गोपू
पला-बढा
ठीक से न लिखा
न पढा
सारा बचपन बह गया
गोपू गरीब रह गया

शादी हुई
गरीब की बीबी ठहरी
कुछ दिन सभी की भाभी हुई
दबंगों की उंगलियों पर नहीं नाची
छिनाल कहाई
कुलटा कहाई
दागी कहाई
गोपू ठहरा मेहनतकश
रोज रोजी कमाता
गरीबी धोनी थी पसीने से
हड्डी-पसली तपाता

अचानक
भटक गये उसके डग
न जाने कब
कच्ची शराब के अड्डों की तरफ
एक दिन मैंने कहा
तुम तो ऐसे न थे गोपू
कहने लगा-
भाई
दिन भर बहुत थकता हूँ
शाम को
दो गिलास गरम-गरम चखता हूँ
गम गलत करता हूँ

बचपन में
गोपू ग्वाला आता था
बूढी गोपुली आमा को बताता था-
आमा
आदमी के शरीर में तीन कीड़े होते हैं
एक दिमाग में
एक दिल में
एक पेट में
एक भी कीड़ा मर गया
तो आदमी मर जाता है

आज गोपू की निष्प्राण देह को
घेर कर खड़े हैं ग्रामीण
मैं समझ नहीं पा रहा
किसने मारा गोपू का कीड़ा
कौन सा कीड़ा मरा
दिमाग का
दिल का
या फिर पेट का?