भारत की संस्कृति के लिए... भाषा की उन्नति के लिए... साहित्य के प्रसार के लिए
लोक संगीत
कविता कोश विशेष क्यों है?
कविता कोश परिवार

"चले लखनऊ पहुंचे दिल्ली / बजरंग बिहारी 'बजरू'" के अवतरणों में अंतर

Kavita Kosh से
यहाँ जाएँ: भ्रमण, खोज
('{{KKGlobal}} {{KKRachna |रचनाकार=बजरंग बिहारी 'बजरू' |अनुवादक= |संग्...' के साथ नया पृष्ठ बनाया)
 
 
पंक्ति 9: पंक्ति 9:
 
<poem>
 
<poem>
 
चले लखनऊ पहुंचे दिल्ली,
 
चले लखनऊ पहुंचे दिल्ली,
चतुर चौगड़ा<ref> </ref> बनिगा गिल्ली<ref> </ref>।
+
चतुर चौगड़ा<ref>खरगोश</ref> बनिगा गिल्ली<ref>गिलहरी</ref>।
  
 
हाटडाग सरदी भय खायिन,
 
हाटडाग सरदी भय खायिन,
झांझर<ref> </ref> भये सुरू मा सिल्ली<ref> </ref>।
+
झांझर<ref>जीर्ण-शीर्ण, कमज़ोर</ref> भये सुरू मा सिल्ली<ref>शिला, चट्टान</ref>।
  
 
समझि बूझि कै करो दोस्ती,
 
समझि बूझि कै करो दोस्ती,
पंक्ति 23: पंक्ति 23:
 
दरकि जाय न पातर झिल्ली।
 
दरकि जाय न पातर झिल्ली।
 
</poem>
 
</poem>
 +
{{KKMeaning}}

21:42, 16 मई 2016 के समय का अवतरण

चले लखनऊ पहुंचे दिल्ली,
चतुर चौगड़ा[1] बनिगा गिल्ली[2]

हाटडाग सरदी भय खायिन,
झांझर[3] भये सुरू मा सिल्ली[4]

समझि बूझि कै करो दोस्ती,
नेक सलाह उड़ावै खिल्ली।

बब्बर सेर कार मा बैठा,
संकट देखि दुबकि भा बिल्ली।

'बजरू' बचि कै रह्यो सहर मा,
दरकि जाय न पातर झिल्ली।

शब्दार्थ
  1. खरगोश
  2. गिलहरी
  3. जीर्ण-शीर्ण, कमज़ोर
  4. शिला, चट्टान