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चलो माज़ी के अंधियारों में थोड़ी रौशनी कर लें / प्रेमचंद सहजवाला


चलो माज़ी[1] के अंधियारों में थोड़ी रौशनी कर लें
चलो यादों के दीपों से फरोजां[2] जिंदगी कर लें

मेरे महबूब तेरी दीद कब होगी न जाने अब
तुम्हारी इंतज़ारी में ज़रा हम शायरी कर लें

तुम्हारे हुस्न को माबूद[3] कर के बन गए काफिर
तुम्हारे आस्तां[4] पर रख के सर अब बंदगी कर लें

समुन्दर अपनी जा पर करते रहियो देवताई बस
तेरे क़दमों को अर्पित शहृ जब तक हर नदी कर लें

नदी पर जंग क्यों है किसलिए है आब[5] पर फितना[6]
मुहब्बत की नदी में मिल के आओ खुदकशी कर लें

  1. अतीत
  2. प्रज्वलित
  3. पूज्य
  4. चौखट
  5. पानी
  6. झगड़ा