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चल बंजारे / हरिवंशराय बच्चन

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चल बंजारे,

तुझे निमंत्रित करती धरती नई,

नया ही आसमान!
चल बंजारे-


दूर गए मधुवन रंगराते,

तरू-छाया-फल से ललचाते,

भृंग-विहंगम उड़ते-गाते,

प्‍यारे, प्‍यारे।
चल बंजारे,

तुझे निमंत्रित करती धरती नई,

नया ही आसमान!
चल बंजारे-


छूट गई नदी की धारा,

जो चलती थी काट कगारा,

जो बहती थी फाँद किनारा,

मत पछता रे।

चल बंजारे,

तुझे निमंत्रित करती धरती नई,

नया ही आसमान!
चल बंजारे-


दूर गए गिरिवर गवींले,

धरती जकड़े, अम्‍बर कीले,

बीच बहाते निर्झर नीले,

फेन पुहारे।
चल बंजारे,

तुझे निमंत्रित करती धरती नई,

नया ही आसमान!
चल बंजारे-


पार हुए मरूतल के टीले,

सारे अंजर-पंजर ढीले,

बैठ न थककर कुंज-करीले,

धूल-धुआँरे!
चल बंजारे,

तुझे निमंत्रित करती धरती नई,

नया ही आसमान!
चल बंजारे-


चलते-चलते अंग पिराते,

मन गिर जाता पाँव उठाते,

अब तो केवल उम्र घटाते

साँझ-सकारे।
चल बंजारे,

तुझे निमंत्रित करती धरती नई,

नया ही आसमान!
चल बंजारे-


क्‍या फिर पट-परिवर्तन होगा?

क्‍या फिर तन कंचन होगा?

क्‍या फिर अमरों-सा मन होगा?

आस लगा रे।

चल बंजारे,

तुझे निमंत्रित करती धरती नई,

नया ही आसमान!
चल बंजारे-


जब तक तेरी साँस न थमती, थमे न तेरा

क़दम, न तेरा कंठ-गान!
चल बंजारे-