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"चाँद तारों का बन / मख़दूम मोहिउद्दीन" के अवतरणों में अंतर

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08:47, 28 अप्रैल 2011 के समय का अवतरण

आज़ादी से पहले, बाद और आगे

मोम की तरह जलते रहे हम शहीदों के तन
रात भर झिलमिलाती रही शम्मे सुबहे वतन
रात भर जगमगाता रहा चाँद-तारों का बन
तिश्नगी<ref>प्यास</ref> थी मगर
तिश्नगी में भी सरशार<ref>मस्त</ref> थे
प्यासी आँखों के खाली कटोरे लिए
मुन्तज़र मर्द व ज़न
मस्तियाँ ख़त्म, मदहोशियाँ ख़त्म थीं, ख़त्म था बाँकपन
रात के जगमगाते दहकते बदन
सुबह दम एक दीवारे ग़म बन गए
ख़ारज़ारे अलम<ref>मुसीबत के काँटों का बन</ref> बन गए
रात की शहरगों का उछलता लहू
जूए ख़ूँ<ref>ख़ून की लहर</ref> बन गया
कुछ इमामाने<ref>नेता</ref> सद मकरोधन<ref>सैकड़ों छल-कपट</ref>
उनकी साँसों में अफ़ई<ref>साँप</ref> की फुन्कार थी
उनके सीने में नफ़रत का काला धुआँ
इक कमींगाह<ref>छुपने की जगह</ref> से
फ़ेंक कर अपनी नोके ज़ुबाँ
ख़ूने नूरे सहर<ref>सुबह के प्रकाश के ख़ून को</ref> पी गए ।

रात की तलछते हैं, अँधेरा भी है
हमदमो
हाथ में हाथ दो
सूए मन्ज़िल<ref>मंज़िल की ओर</ref> चलो
मंज़िले प्यार की
मंज़िले दार<ref>फाँसी की मंज़िल</ref> की
कूए दिलदार<ref>प्रेमिका की गली</ref> की मंज़िलें
दोश पर अपनी-अपनी सलीबें उठाए चलो

शब्दार्थ
<references/>