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चाहत किसी भी तौर से वादा-तलब नहीं / कनुप्रिया

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चाहत किसी भी तौर से वादा-तलब नहीं ।
ये मर्ज़ चारागर से मुदावा-तलब नहीं ।

हम हैं बस एक तेरे तलबगार और हम
ऐसे कि जो किसी से तकाज़ा तलब नहीं ।

हम शायरों को इश्क़ ख़ुदा-ए-सुख़न से है
हम काफ़िरों का इश्क़ मसीहा तलब नहीं ।

दरकार-ए-आब आपको है आप जानिए
सहरा तो जानता है वो दरिया तलब नहीं ।

जंगल पहाड़ रात नदी रंग धूप शाम
मालिक से भी जहान को क्या-क्या तलब नहीं ।

मैं दार-ए-ग़म हूँ मेरी जायदाद अश्क हैं
ये बाम-ओ-दर ख़ुशी से तमाशा तलब नहीं ।

जुगनू को है ग़रज़ करे वो शम्स का तवाफ़[1]
सूरज को जुगनुओं का उजाला तलब नहीं ।

हासिल है ये जहान मुझे तेरे मा-सिवा
तेरे बजाय जबकि ज़ियादा तलब नहीं ।

तनहाई बदहवासी सदा-ए-सुकूत[2] सब
हर सिम्त चीख़ती है मैं गोशा तलब नहीं ।

शब्दार्थ
  1. सूर्य की परिक्रमा
  2. ख़ामोशी की पुकार