भारत की संस्कृति के लिए... भाषा की उन्नति के लिए... साहित्य के प्रसार के लिए

जब बज़्म में बुताँ की वो रश्के-मह गया था / सौदा

Kavita Kosh से
अजय यादव (चर्चा | योगदान) द्वारा परिवर्तित 21:20, 14 नवम्बर 2009 का अवतरण (नया पृष्ठ: {{KKGlobal}} {{KKRachna |रचनाकार=सौदा }} <poem> जब बज़्म में बुताँ की वो रश्के-मह गया थ…)

(अंतर) ← पुराना अवतरण | वर्तमान अवतरण (अंतर) | नया अवतरण → (अंतर)
यहाँ जाएँ: भ्रमण, खोज

जब बज़्म में बुताँ की वो रश्के-मह गया था
आपस में हर परी-रू मुँह देख रह गया था
क्या-क्या दिला के ग़ैरत रक्खा में बाज़ दिल को
वरना नसहनी बातें तेरी मैं सह गया था