भारत की संस्कृति के लिए... भाषा की उन्नति के लिए... साहित्य के प्रसार के लिए
लोक संगीत
कविता कोश विशेष क्यों है?
कविता कोश परिवार

जब भी उठो लिहाफ़ हटाकर सुबह-सुबह / विनय कुमार

Kavita Kosh से
Pratishtha (चर्चा | योगदान) द्वारा परिवर्तित 21:35, 25 जुलाई 2008 का अवतरण (New page: {{KKGlobal}} {{KKRachna |रचनाकार=विनय कुमार |संग्रह=क़र्जे़ तहज़ीब एक दुनिया है / विनय क...)

(अंतर) ← पुराना अवतरण | वर्तमान अवतरण (अंतर) | नया अवतरण → (अंतर)
यहाँ जाएँ: भ्रमण, खोज

जब भी उठो लिहाफ़ हटाकर सुबह-सुबह।
छत में नयी दरार, नया डर सुबह-सुबह।

अंधों को रोशनी की ज़रूरत पडी है फ़िऱ
जलने लगा है फ़िऱ किसी का घर सुबह-सुबह।

कैसा है अस्पताल यह, कैसा इलाज है
नश्तर चला था रात को खंजर सुबह-सुबह।

छेके हुए है रास्ते सूरज पठान सा
जाएं कहाँ निगाह बचाकर सुबह-सुबह।

लडना है हमें सर उठा के रोज़ शाम तक
कैसे झुकाएँ हम कहीं पे सर सुबह-सुबह।

ख़बरों से लगी आग बुझाते हैं चाय से
करते हैं मस्लेहत को कारगर सुबह-सुबह।

सब राज़ शब-ए-वस्ल के रख दे न धूप में
रखिए कड़ी निगाह चांद पर सुबह-सुबह।

पीते ज़रा सा कम तो नशा सर में टूटता
टूटा है मेरे पाँव से सागर सुबह-सुबह।

तुम जा छुपे थे रात में, तुझमें छुपी है रात
लो हो गया हिसाब बराबर सुबह-सुबह।