भारत की संस्कृति के लिए... भाषा की उन्नति के लिए... साहित्य के प्रसार के लिए
लोक संगीत
कविता कोश विशेष क्यों है?
कविता कोश परिवार

जब मेरे वस्त्रों की चमक लुप्त हो चुकी है, / गुलाब खंडेलवाल

Kavita Kosh से
Vibhajhalani (चर्चा | योगदान) द्वारा परिवर्तित 11:03, 20 अप्रैल 2017 का अवतरण ('{{KKGlobal}} {{KKRachna |रचनाकार=गुलाब खंडेलवाल |संग्रह=बूँदे - जो...' के साथ नया पृष्ठ बनाया)

(अंतर) ← पुराना अवतरण | वर्तमान अवतरण (अंतर) | नया अवतरण → (अंतर)
यहाँ जाएँ: भ्रमण, खोज

जब मेरे वस्त्रों की चमक लुप्त हो चुकी है,
मेरे द्वार पर यह डोली कैसी रुकी है!
ओ मेरे सपनों के राजकुमार!
क्या तुझे मेरी याद अब आयी है!
हाय! तूने कितनी प्रतीक्षा करवायी है!
और आया भी कब! जब मेरी मेंहदी का रंग उतर गया है!
मेरा मोतियों का हार टूटकर बिखर गया है!