भारत की संस्कृति के लिए... भाषा की उन्नति के लिए... साहित्य के प्रसार के लिए
लोक संगीत
कविता कोश विशेष क्यों है?
कविता कोश परिवार

जब से मुझको तूने छुआ है / गौतम राजरिशी

Kavita Kosh से
यहाँ जाएँ: भ्रमण, खोज

जब से मुझको तू ने छुआ है
रातें पूनम दिन गिरुआ है

इक बीज पड़ा है इश्क का तो
नस-नस में पनपा महुआ है

तू जो गया तो अहसासों का
मन अब इक खाली बटुआ है

टूटा है तो दर्द भी होगा
दिल तो शीशम ना सखुआ है

तेरे चेहरे की रंगत से
मेरा हर मौसम फगुआ है

फेरो ना यूं नजरें मुझसे
बहने लगेगी फिर पछुआ है

हँस के तू ने देख लिया तो
जग ये सारा हँसता हुआ है