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ज़मीन चीख़ रही है के आसमान गिरा / 'फ़ज़ा' इब्न-ए-फ़ैज़ी

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ज़मीन चीख़ रही है के आसमान गिरा
ये कैसा बोझ हमारे बदने पे आन गिरा

बहुत सँभाल के रख बे-सबात लम्हों को
ज़रा जो सनकी हवा रेत का मकान गिरा

इस आईने ही में लोगों ने ख़ुद को पहचाना
भला हुआ के मैं चेहरों के दरमियान गिरा

रफ़ीक़-ए-सम्त-ए-सफ़र होगी तो हवा होगी
ये सोच कर न सफ़ीने का बाद-बान गिरा

मैं अपने अहद की ये ताज़गी कहाँ ले जाऊँ
इक एक लफ़्ज़ क़लम से लहूलुहान गिरा

क़रीब ओ दूर कोई शोला-ए-नवा भी नहीं
ये किन अँधेरों में हाथों शम्मा-दान गिरा

‘फ़ज़ा’ को तोड़ तो फेंका हवाओं ने लेकिन
ये फूल अपनी ही शाख़ों के दरमियान गिरा