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जादूगरनी / अमृता सिन्हा

मैं जादूगरनी नहीं
पर सीखना चाहती हूँ जादूगरी

ताकि
धनिया, मेरी सहायिका
जिसके
बेटे ने कल कर ली आत्महत्या
मानसिक असंतुलन के कारण
विक्षिप्त माँ जो लगातार पुकार रही है,

मिला सकूँ उसे उस ईश्वर से
जिसका नाम अब भी उसके होंठों पर है
इस यक़ीन के साथ कि उसका बेटा
लौट आयेगा, सुन कर उसका आर्त्तनाद
ईश्वर भी पिघल जाएगा
काश! मैं
सोख पाती सारे दर्द, सारी पीड़ा
घुमा कर अपनी जादुई छड़ी

सीख सकूँ ऐसा तिलिस्म
कि पोंछ सकूँ सारी दुर्भावनाओं को

पड़ोस की बारह साल की बिटिया
जो असाध्य रोग से ग्रसित
पथराई-सी एकटक शून्य में निहारती रहती है
उसके मौन होंठों पर
धर सकूँ कुछ शब्द

करूँ ऐसा जादू कि
सड़क के कोने फेंके गए आईसक्रीम के
झूठे कपों को उठा कर चाटते
फेंकें गए ख़ाली दोनों में चाट पकौड़ों के अंश तलाशते
झोपड़पट्टी के बच्चों की
बदल सके तक़दीर
उनके
आगे हो भरी पूरी थाली
और ठंडी आइसक्रीम

पर जादू तो बस एक सपना है
हक़ीक़त में भूख
और
रोटी के बीच लगातार जूझना है

मैं चाहती हूँ
युगों से जागी आँखों में नींद बोना,
हथेली पर खिंची आड़ी-तिरछी रेखाओं की
तासीर बदलना

पर नहीं आती मुझे जादूगरी
मैं अपनी भिंची मुट्ठी में
अपनी सोच को समा कर
फेंक देती हूँ, नीले आसमान की ओर

वहाँ बैठा रहनुमा शायद
कर सके कोई कमाल
सुन सके सबकी फ़रियाद।