भारत की संस्कृति के लिए... भाषा की उन्नति के लिए... साहित्य के प्रसार के लिए
लोक संगीत
कविता कोश विशेष क्यों है?
कविता कोश परिवार

ज्यौंही कछु कहन संदेश लग्यौ त्यौंही लख्यौ / जगन्नाथदास ’रत्नाकर’

Kavita Kosh से
Lalit Kumar (चर्चा | योगदान) द्वारा परिवर्तित 11:44, 4 जुलाई 2012 का अवतरण ('{{KKGlobal}} {{KKRachna |रचनाकार=जगन्नाथदास 'रत्नाकर' |संग्रह=उद्ध...' के साथ नया पन्ना बनाया)

(अंतर) ← पुराना अवतरण | वर्तमान अवतरण (अंतर) | नया अवतरण → (अंतर)
यहाँ जाएँ: भ्रमण, खोज

ज्यौंही कछु कहन संदेस लग्यौ त्यौंही लख्यौ
प्रेम-पूर उमंगि गरे लौं चढ्यौ आवै है।
कहै रत्नाकर न पाँव टिकि पावैं नैंकु ।
एसौ दृग- द्वारनि स -वेग कढ़यौ आवै है।
मधुपुर राखन कौ वेगि कछु ब्यौंत गढौ
धाइ चढ़ौ वट कै न जोपै गढ़यौ आवै है ।
आयौ भज्यौ भूपति भागीरथ लौं हौं तौ नाथ
साथ लायौ सोई पुन्य- पाथ बढयौ आवै है ।।