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झड़ जाऊँ / राजकिशोर सिंह

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झड़ता देऽकर
पफूलों के पराग को
मन करता मैं भी
उसी समान झड़ जाऊँ
मर जाऊँ
दुऽ सहा नहीं जाता
रोये बिना रहा नहीं जाता
लेकिन
निगाहें घुमाता हूँ
इध्र-उध्र
लोग टोकते हैं, रोकते हैं
देऽते हैं मेरी आँऽें
कहीं नम तो नहीं हैं
कहीं गम तो नहीं हैं
अवलोकता है
मेरी पुतली
महसूसता है

कहीं गीली तो नहीं हुई
कहीं लाल-पीली तो नहीं हुई
विवश होकर
तब रोक लेता हूँ आँसू
जमा कर लेता हूँ अपने अंदर
जाकर सुनसान में
दूर वीरान में
चुपचाप रोता हूँ
पफूटपफूट कर
वहाँ ऽूब बहा लेता हूँ आँसू
रो लेता हूँ मन भर गम में
तन ऽो लेता हूँ गम में
लगता है दुऽ का ग्रापफ
घरों की दीवारों पर बनता होगा
बंद कोठरियों की
किवाड़ों पर बनता होगा
पता नहीं
वही महसूसता होगा
मेरे आघात
मेरे हालात।