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टीले के वक्ष पर / मिख़ाइल लेरमन्तफ़ / मदनलाल मधु

बहुत बड़े टीले की चौड़ी छाती पर
एक सुनहरी बदली ने दी रात बिता,
सुबह-सवेरे उठ अपने पथ पर चल दी
गगन-नीलिमा में मुस्काई, दिखा अदा।

पर बूढ़े टीले की गहरी झुर्री पर
चिह्न नमी का छोड़ा, लुप्त नहीं होता,
डूब सोच में, मरुथल में वह एकाकी
खड़ा हुआ है, अब धीरे-धीरे रोता।

1841
मूल रूसी से अनुवाद : मदनलाल मधु

और अब यह कविता मूल रूसी भाषा में पढ़ें

                    УТЕС
Ночевала тучка золотая
На груди утеса-великана;
Утром в путь она умчалась рано,
По лазури весело играя;

Но остался влажный след в морщине
Старого утеса. Одиноко
Он стоит, задумался глубоко
И тихонько плачет он в пустыне.

1841