भारत की संस्कृति के लिए... भाषा की उन्नति के लिए... साहित्य के प्रसार के लिए

डेली में मछली / प्रमोद धिताल / सरिता तिवारी

Kavita Kosh से
Sharda suman (चर्चा | योगदान) द्वारा परिवर्तित 09:19, 6 सितम्बर 2018 का अवतरण (Sharda suman ने डेली1 में मछली / प्रमोद धिताल / सरिता तिवारी पृष्ठ [[डेली में मछली / प्रमोद धिताल / सरिता ति...)

(अंतर) ← पुराना अवतरण | वर्तमान अवतरण (अंतर) | नया अवतरण → (अंतर)
यहाँ जाएँ: भ्रमण, खोज

डेली[1] में
अब कहाँ मिलेगी मछली!

हैं दो–चार लहसुन की पुटलियाँ
कुछ दाने आलू
प्याज और मिर्चा

मछली?
मछली तो इस मगुवै नदी में
बहुत थी बहुत!

माघी[2] में
जितिया[3] और अमोशा[4] में
गिनती नहीं
कितनी मारी मैंने
मेरी जवानी जैसी मछली!

मेरी उमर कि तरह
अभी तो
बहकर चली गयी सभी

फिर भी
हर साल बुनता हूँ डेली
काट काटकर काँस की महीन साखें

तअज्जुब में हूँ
किस शाखा में घुस गई होंगी?
किस नदी में मिल गई होंगी?
सारी की सारी मछलियाँ?

आदमी और मछली वैसे ही है
बहकर जाने के बाद
कभी लौटकर न आने वाले!

कोई तो लौटा दो नदी कि इस धारा में
सुनहरी मछलियों की फ़ौज
कि देखूँ किनारे से
अपना यौवन लौटकर आता हुआ!

शब्दार्थ
  1. काँस नाम की वनस्पति से बनाया हुआ मछली रखने वाला बर्तन।
  2. एक पर्व
  3. थारु महिलाओं द्वारा मनाया जाने वाला एक पर्व, तीज।
  4. थारु समुदाय में पितरों के सम्मान में मनाया जाने वाला एक पर्व।