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तंगहाली अब न छोड़ेगी मुझे / हरिराज सिंह 'नूर'

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तंगहाली अब न छोड़ेगी मुझे।
उम्र भर यूँ ही झिंझोड़ेगी मुझे।

चैन से कब रहने देगी ज़िन्दगी?
आख़िरी दम तक निचोड़ेगी मुझे।

पत्थरों को मारकर बदक़िस्मती,
आइनों की तरह तोड़ेगी मुझे।

दर-ब-दर भटका के मेरी ज़िन्दगी,
अब हवा किस सम्त मोड़ेगी मुझे।

तोड़ कर उम्मीद का कच्चा मकां,
सब्र से वो ‘नूर’ जोड़ेगी मुझे।