भारत की संस्कृति के लिए... भाषा की उन्नति के लिए... साहित्य के प्रसार के लिए

तीन कुंडलिया / लवकुश शर्मा

Kavita Kosh से
सशुल्क योगदानकर्ता ५ (चर्चा | योगदान) द्वारा परिवर्तित 14:33, 19 अगस्त 2019 का अवतरण ('{{KKGlobal}} {{KKRachna |रचनाकार=लवकुश शर्मा |अनुवादक= |संग्रह= }} {{KKCat...' के साथ नया पृष्ठ बनाया)

(अंतर) ← पुराना अवतरण | वर्तमान अवतरण (अंतर) | नया अवतरण → (अंतर)
यहाँ जाएँ: भ्रमण, खोज

बोली गुरतुर बोल रे, करू कसा झन बोल
भितरे भीतर तउल के मुंह के खइरपा खोल

मुंह के खइरप खोल, बोल अमरित आस वानी
वैरी विसरय बैर, पिपल के होवय पानी

कह लवकुश महाराज, चला झन बंदूक गोली
जीभ मा नइये हाड़ नरम बोले वर बोली ।1।

कागा रे एक बात सुन काबर होय उदास
फोर अभी झन आंखी ला प्रभु देखे के आस

प्रभु देखे के आस, हे भाई देखन देना
वांचे हे अऊ मांस, देह मा वो खा लेना
 
कह लवकुश महराज आज सब देहूं लागा
धन्न मोर हे भाग बखानौ कारे कागा ।2।

बैतरनी तर जात हें गौ के पूछी छुवाय
कतका अचरित बात हे काला का समझाय

काला का समझाय, जीयत भर अतलंग करले
मरती बेर आय गाय के पूछिए धरले
कह लवकुश महराज कोन भरही तोर भरनी
तन मन धन ला बांट, तभे जावे बैतरनी ।3।