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"तुम अपनी बेटियों को... / अंजना संधीर" के अवतरणों में अंतर

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तुम अपनी बेटियों को
 
तुम अपनी बेटियों को

10:18, 31 अक्टूबर 2009 का अवतरण

तुम अपनी बेटियों को
इन्सान भी नहीं समझते
क्यों बेच देते हो अमरीका के नाम पर?

खरीददार अपने मुल्क में क्या कम हैं कि...
बीच में सात समुंदर पार डाल देते हो?
जहाँ से सिसकियाँ भी सुनाई न दे सकें
डबडबाई आँखें दिखाई न दे सकें
न जहाँ तुम मिलने जा सको
न कोई तुम्हें कुछ बता सके

कभी वापस आएँ भी तो
लाशें बने शरीर... जिन पर गहने और
मंहगे कपड़े पड़े हों...!
तुम्हारी शान बढ़ाएँ और तुम्हारे पास भी
बिना रोये लौट जाएँ

उसी सोने के पिंजरे में
जहाँ अमरीका की कीमत
मज़दूरी से भी चुकता नहीं होती !