भारत की संस्कृति के लिए... भाषा की उन्नति के लिए... साहित्य के प्रसार के लिए
लोक संगीत
कविता कोश विशेष क्यों है?
कविता कोश परिवार

तुम कहो मन क्या करूं मैं / पूनम गुजरानी

Kavita Kosh से
सशुल्क योगदानकर्ता ५ (चर्चा | योगदान) द्वारा परिवर्तित 23:46, 9 दिसम्बर 2019 का अवतरण ('{{KKGlobal}} {{KKRachna |रचनाकार=पूनम गुजरानी |अनुवादक= |संग्रह= }} {{KK...' के साथ नया पृष्ठ बनाया)

(अंतर) ← पुराना अवतरण | वर्तमान अवतरण (अंतर) | नया अवतरण → (अंतर)
यहाँ जाएँ: भ्रमण, खोज

इस पार है बाबुल का घर
 उस पार साथी है विकल
 तुम कहो मन करता करूं मैं

खोलते भुजपाश मन के
स्वप्न व्याकुल हो चले
बन रही है एक कविता
मधुमास के अम्बर तले

मां का है इस पार आंचल
प्रीत का उस पार काजल
तुम कहो मन क्या करूं मैं

उसने रखी है शीष पर
आशीष की गठरी अटल
आंसू छुपाती आँख के
उपदेश देती है विमल

इस पार है भाई बहन
उस पार है आतुर सजन
तुम कहो मन क्या करूं मैं


देहरी को देकर दुआ
किस ओर अपने डग भरूं
चारों तरफ तिलिस्मी जाल
ह्रदय बता किस नाम करूं

इस पार पहचाने सभी
उस पार अनजाने सभी
तुम कहो मन क्या करूं मैं