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अपने विचारों को प्रस्तुत करने में कोई भी व्यक्ति तर्क का सहारा ले सकता है। जहाँ तर्क समाप्त हो जाते हैं, वहाँ से कविता शुरू होती है। जहाँ भाव जुड़ते हैं, वहाँ कविता का स्रोत बहने लगता है। अँजुरी भर आसीस से आगे मैं घर लौटा में क्या कहूँ, कैसे कहूँ भूमिका में बात कथ्य और प्रस्तुति को लेकर थी। यह भी मैंने कहा था-अपनी कविता के बारे में बात करना सबसे कठिन है। इतने लम्बे अन्तराल में बहुत कुछ बदल गया। अगर आज भी कुछ नहीं बदला, तो वह है मेरा हृदय। आज भी किसी दुखी के लिए उससे पहले दुखी हो जाता है, प्यार करने वाले, सम्मान देने वाले के लिए विनत हो जाता है। अवसरवाद और उपभोग की संस्कृति के इस युग में बहुत सारे साथी आए और विगत वर्षों में कहीं दूर खो गए. जो अच्छे थे, वे आज भी साथ हैं, कुछ अच्छे और भी आए और मन-प्राण से जुड़े। कविता मेरी जीवन-रेखा है। मैं बिना खाए काफ़ी देर तक रह सकता हूँ; लेकिन बिना साँस लिये तो नहीं रह सकता। कविता मेरे लिए वही साँसों का आना-जाना है। गुस्सा आता है, नहीं छुपता, किसी बात पर आहत होता हूँ, नहीं छुपा सकता, किसी के प्रति असीम अनुराग है, नहीं छुपाता, सम्मान है तो उसे व्यक्त करने में देरी नहीं लगाता। इस संग्रह की कविताओं में प्रेम विषयक कविताएँ अधिक हैं। दोहे अधिक हैं, मुक्तक अधिक हैं, तो अपेक्षाकृत छोटी कविताएँ भी अधिक हैं। इन कविताओं में मैं अकेला नहीं हूँ, वे भी हैं, जो सदा मेरे साथ हैं, भावनात्मक रूप से शक्ति के रूप में, प्रेरणा के रूप में, एक आश्वस्ति के रूप में यह कहते हुए-हम आपके साथ हैं, अहर्निश!
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आज के समाज में लूट-खसोट, आपा-धापी, स्वार्थपरता, अवसरवादिता सभी जायज़ है, क्योंकि ये भोगवादी वर्ग की प्राथमिकताएँ हो सकती है। इन मनोरोगियों के लिए सद्भाव, प्रेम, आत्मीयता, मानवीय संवेदना, किसी का दर्द पूछ लेना अनावश्यक ही नहीं, अमानवीय कृत्य हो सकते हैं। जहाँ तक मेरी कविता में किससे कहूँ की बात है, मैं अपने उस प्रत्येक आत्मीय को शामिल करता हूँ, जो नि: स्वार्थरूप से मुझे अपना समझता है। 'कितना कहूँ' यह एक सीमा है कि मैं कितना जुड़ाव महसूस करता हूँ, किससे कितनी अन्तरंगता है। किसको कब मिलना है, कब तक सहायक या प्रेरक होना है, यह ईश्वर सुनिश्चित करता है। जब अच्छे लोग मिलते हैं, तो यह पंक्ति बरबस मन में उभरती है-कितना अच्छा होता! जो तुम बरसों पहले मिल जाते। ईश्वर से यही कहूँगा कि जो अच्छे मिले हैं, वे अन्तिम पल तक जुड़े रहें। जो छूट जाते हैं, उनके लिए यही आता है-'कितना अच्छा होता वे पहले ही जाते छूट।'
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भाई सुकेश साहनी, दीदी सुदर्शन रत्नाकर, कमला निखुर्पा, डॉ भावना कुँअर, कृष्णा वर्मा, डॉ ज्योत्स्ना शर्मा, डॉ कविता भट्ट रचनात्मक स्तर पर निरन्तर जुड़े हुए हैं। इन सबकी आत्मीयता मुझे बार-बार अपना भी कुछ कीजिए की भी याद दिलाती रहती है। पिछले दो वर्षों में 'हरियाली और पानी' के अलावा कोई निजी पुस्तक नहीं आई. जैसा भी बन पड़ा, किससे कितने कह पाया, यह तो समय ही बताएगा। जो मेरी इन रचनाओं के साक्षी रहे है, उनमें झरे हरसिंगार समूह का भी बड़ा योगदान है, जो मेरी उलटबाँसियों को चुपचाप झेलते रहे और मैं कुछ न कुछ कच्चा-पक्का लिखता-रचता रहा।
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इस पुस्तक के लिए जो प्रेरक हैं, उनका आभारी हूँ। मेरे रचनात्मक कार्य की निरन्तरता को बनाए रख्नने का श्रेय भाई भूपाल सूद जी की आत्मीयता को जाता है। सभी आत्मीयजन का अतिशय आभार!
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आपका स्नेह तुम सर्दी की धूप संग्रह को मिलेगा, यह विश्वास है। आप सबका इसी तरह साथ रहा, तो भविष्य में भी कुछ न कुछ आपके बीच लेकर आता रहूँगा।
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रामेश्वर काम्बोज 'हिमांशु'
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7 मई, 2018, सोमवार

05:03, 31 मई 2019 का अवतरण

भाव-कलश
Bhavkalash.jpg
रचनाकार रामेश्वर काम्बोज 'हिमांशु'
प्रकाशक अयन प्रकाशन, 1/20 महरौली , ,नई दिल्ली–110030
वर्ष 2018
भाषा हिन्दी
विषय कविताएँ
विधा
पृष्ठ 140
ISBN 978-93-87622-74-6
विविध मूल्य(सजिल्द) :280
इस पन्ने पर दी गई रचनाओं को विश्व भर के स्वयंसेवी योगदानकर्ताओं ने भिन्न-भिन्न स्रोतों का प्रयोग कर कविता कोश में संकलित किया है। ऊपर दी गई प्रकाशक संबंधी जानकारी छपी हुई पुस्तक खरीदने हेतु आपकी सहायता के लिये दी गई है।

किससे कहूँ, कितना कहूँ अपने विचारों को प्रस्तुत करने में कोई भी व्यक्ति तर्क का सहारा ले सकता है। जहाँ तर्क समाप्त हो जाते हैं, वहाँ से कविता शुरू होती है। जहाँ भाव जुड़ते हैं, वहाँ कविता का स्रोत बहने लगता है। अँजुरी भर आसीस से आगे मैं घर लौटा में क्या कहूँ, कैसे कहूँ भूमिका में बात कथ्य और प्रस्तुति को लेकर थी। यह भी मैंने कहा था-अपनी कविता के बारे में बात करना सबसे कठिन है। इतने लम्बे अन्तराल में बहुत कुछ बदल गया। अगर आज भी कुछ नहीं बदला, तो वह है मेरा हृदय। आज भी किसी दुखी के लिए उससे पहले दुखी हो जाता है, प्यार करने वाले, सम्मान देने वाले के लिए विनत हो जाता है। अवसरवाद और उपभोग की संस्कृति के इस युग में बहुत सारे साथी आए और विगत वर्षों में कहीं दूर खो गए. जो अच्छे थे, वे आज भी साथ हैं, कुछ अच्छे और भी आए और मन-प्राण से जुड़े। कविता मेरी जीवन-रेखा है। मैं बिना खाए काफ़ी देर तक रह सकता हूँ; लेकिन बिना साँस लिये तो नहीं रह सकता। कविता मेरे लिए वही साँसों का आना-जाना है। गुस्सा आता है, नहीं छुपता, किसी बात पर आहत होता हूँ, नहीं छुपा सकता, किसी के प्रति असीम अनुराग है, नहीं छुपाता, सम्मान है तो उसे व्यक्त करने में देरी नहीं लगाता। इस संग्रह की कविताओं में प्रेम विषयक कविताएँ अधिक हैं। दोहे अधिक हैं, मुक्तक अधिक हैं, तो अपेक्षाकृत छोटी कविताएँ भी अधिक हैं। इन कविताओं में मैं अकेला नहीं हूँ, वे भी हैं, जो सदा मेरे साथ हैं, भावनात्मक रूप से शक्ति के रूप में, प्रेरणा के रूप में, एक आश्वस्ति के रूप में यह कहते हुए-हम आपके साथ हैं, अहर्निश!

आज के समाज में लूट-खसोट, आपा-धापी, स्वार्थपरता, अवसरवादिता सभी जायज़ है, क्योंकि ये भोगवादी वर्ग की प्राथमिकताएँ हो सकती है। इन मनोरोगियों के लिए सद्भाव, प्रेम, आत्मीयता, मानवीय संवेदना, किसी का दर्द पूछ लेना अनावश्यक ही नहीं, अमानवीय कृत्य हो सकते हैं। जहाँ तक मेरी कविता में किससे कहूँ की बात है, मैं अपने उस प्रत्येक आत्मीय को शामिल करता हूँ, जो नि: स्वार्थरूप से मुझे अपना समझता है। 'कितना कहूँ' यह एक सीमा है कि मैं कितना जुड़ाव महसूस करता हूँ, किससे कितनी अन्तरंगता है। किसको कब मिलना है, कब तक सहायक या प्रेरक होना है, यह ईश्वर सुनिश्चित करता है। जब अच्छे लोग मिलते हैं, तो यह पंक्ति बरबस मन में उभरती है-कितना अच्छा होता! जो तुम बरसों पहले मिल जाते। ईश्वर से यही कहूँगा कि जो अच्छे मिले हैं, वे अन्तिम पल तक जुड़े रहें। जो छूट जाते हैं, उनके लिए यही आता है-'कितना अच्छा होता वे पहले ही जाते छूट।'

भाई सुकेश साहनी, दीदी सुदर्शन रत्नाकर, कमला निखुर्पा, डॉ भावना कुँअर, कृष्णा वर्मा, डॉ ज्योत्स्ना शर्मा, डॉ कविता भट्ट रचनात्मक स्तर पर निरन्तर जुड़े हुए हैं। इन सबकी आत्मीयता मुझे बार-बार अपना भी कुछ कीजिए की भी याद दिलाती रहती है। पिछले दो वर्षों में 'हरियाली और पानी' के अलावा कोई निजी पुस्तक नहीं आई. जैसा भी बन पड़ा, किससे कितने कह पाया, यह तो समय ही बताएगा। जो मेरी इन रचनाओं के साक्षी रहे है, उनमें झरे हरसिंगार समूह का भी बड़ा योगदान है, जो मेरी उलटबाँसियों को चुपचाप झेलते रहे और मैं कुछ न कुछ कच्चा-पक्का लिखता-रचता रहा।

इस पुस्तक के लिए जो प्रेरक हैं, उनका आभारी हूँ। मेरे रचनात्मक कार्य की निरन्तरता को बनाए रख्नने का श्रेय भाई भूपाल सूद जी की आत्मीयता को जाता है। सभी आत्मीयजन का अतिशय आभार!

आपका स्नेह तुम सर्दी की धूप संग्रह को मिलेगा, यह विश्वास है। आप सबका इसी तरह साथ रहा, तो भविष्य में भी कुछ न कुछ आपके बीच लेकर आता रहूँगा।

रामेश्वर काम्बोज 'हिमांशु'

7 मई, 2018, सोमवार