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तुलसी जिन्दाबाद! / उर्मिल सत्यभूषण

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बहुत साल पहले
मुझे इस शाला में
बड़े स्नेह से
रोपा गया था...
काश! इस पौधे को
लगातार स्नेह से सींचा
गया होता तो आज मैं
एक बृहद घेरे वाला
हरित, फलित
बिरवा होती...
सींचे न जाने के बावजूद
मैंने अपनी जड़ें नहीं छोड़ी
बरसाती पानी पीकर भी
मैंने अपने अस्तित्व
को बचाये रखा
किन्तु आज ये कौन
से हाथ मुझे नेस्तोनाबूद
करने को तैयार हो उठे हैं।
मुझे उखाड़ फेंकने को
बेकरार....
उन्हें नहीं मालूम
यह समूचा वातावरण
जिसमें कितने ही सालों से
मेरी भीनी खुशबू घुलती रही है
मेरे बौने से अस्तित्व ने
प्रदूषण को दूर करने के
हज़ारों-हज़ार नन्हें-नन्हें
प्रयास किये हैं।
यह समूचा वातावरण
लरज़ उठेगा।
हवा की सरगोशियां, ख़ामोश
गुपचुप कानाफूसियां
विद्रोह को जन्म देंगी
और रोक देंगी कुठार लिये हाथों को
मेरे होंठों की हल्की सी
जुम्बिश और मेरी आंखों में
लरजती हुई नमी और उस
नमी से झांकती चिंगारी
शोले भड़का देगी
समूचा वातावरण गूंज उठेगा नारों से
प्रतिवाद! प्रतिवाद! तुलसी, जिंदाबाद!