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दिन एक सितम, एक सितम रात करो हो / कलीम आजिज़

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दिन एक सितम, एक सितम रात करो हो ।
वो दोस्त हो, दुश्मन को भी जो मात करो हो ।।

मेरे ही लहू पर गुज़र औकात करो हो,
मुझसे ही अमीरों की तरह बात करो हो ।

हम ख़ाकनशीं तुम सुखन आरा ए सरे बाम,
पास आके मिलो दूर से क्या बात करो हो ।

हमको जो मिला है वो तुम्हीं से तो मिला है,
हम और भुला दें तुम्हें? क्या बात करो हो ।

दामन पे कोई छींट न खंजर पे कोई दाग,
तुम क़त्ल करो हो कि करामात करो हो ।

यूं तो कभी मुँह फेर के देखो भी नहीं हो,
जब वक्त पड़े है तो मुदारात करो हो ।

बकने भी दो आजिज़ को जो बोले है बके है,
दीवाना है, दीवाने से क्या बात करो हो ।