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दिल दुखा था मिरा ऐसा कि दिखाया न गया / सय्यद बशीर हुसैन बशीर

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दिल दुखा था मिरा ऐसा कि दिखाया न गया
दर्द इतना था कि ख़ुद उन से बढ़ाया न गया

बे-ख़ुद-ए-इश्क से फिर होश में आया न गया
सर जो सज्दे में झुकाया तो उठाया न गया

राज़ उस पर्दा-नशीं का कभी पाया न गया
महरम-ए-राज़ से भी राज़ बताया न गया

आफ़रीं लज़्ज़त-ए-नज़्ज़ारा ख़ुशा आलिम-ए-कैफ़
दिल का आना था कि फिर होश में आया न गया

लब पे अपने न कभी हर्फ़-ए-तमन्ना आया
राज़ दिल का मगर आँखों से छुपाया न गया

इश्क से दिल ने किसी तरहा फ़ुर्सत पाई
ये वो शोला है कि दहका तो बुझाया न गया

जल्वा यूँ आम किया उस ने कि सब ने देखा
पर्दा यूँ उस ने गिराया कि उठाया न गया