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दूर से ही क़रीब लगते हैं / बी. आर. विप्लवी

दूर से ही क़रीब लगते हैं
उनसे रिश्ते अज़ीब लगते हैं

उनकी आराइशों[1] से क्या लेना
उनके गेसू सलीब लगते हैं

जो हुकूमत से लड़ते रहते हैं
वो बड़े बदनसीब लगते हैं

नेक नीयत नहीं दुआओं में
लोग दिल से ग़रीब लगते हैं

'विप्लवी' सोने की कलम वाले
आज आला अदीब[2] लगते हैं

शब्दार्थ
  1. सजावट
  2. साहित्यकार