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देते हैं / रामेश्वरलाल खंडेलवाल 'तरुण'

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वे गालियाँ देते हैं।
किसी का कुछ लेते तो नहीं-
-देते हें।
अभिव्यक्ति का सुख लेते हैं।
अभिव्यक्ति-
कला-जीवन का सार-सत्व-
उस पर बन्धन कैसा?
आपाधापी, स्वार्थ, स्पर्द्धा,
संग्रह और भोग के युग में-
श्रद्धानुसार हृदय की ठेठ गहराई से,
जो खुल कर देते हैं-
जगत् में ऐसे कते हैं?