भारत की संस्कृति के लिए... भाषा की उन्नति के लिए... साहित्य के प्रसार के लिए
लोक संगीत
कविता कोश विशेष क्यों है?
कविता कोश परिवार

देवी (सॉनेट)/ ज़िया फ़तेहाबादी

Kavita Kosh से
Ravinder Kumar Soni (चर्चा | योगदान) द्वारा परिवर्तित 08:33, 11 अप्रैल 2011 का अवतरण

(अंतर) ← पुराना अवतरण | वर्तमान अवतरण (अंतर) | नया अवतरण → (अंतर)
यहाँ जाएँ: भ्रमण, खोज

तुझे देवी बना कर पूजता हूँ दिल के मंदिर की
तेरे ही गीत साज़ ए दो जहाँ पर गाता रहता हूँ
जबीन ए शौक़ झुक कर तेरे क़दमों से नहीं उठती
उम्मीदों से दिल ए मासूम को बहलाता रहता हूँ
 
पुजारी बन के तेरा, बेनियाज़ ए दीन ओ दुनिया हूँ
ताल्लुक़ अब ख़ुदा ओ हश्र से कुछ भी नहीं मुझ को
चमन में रह के भी अहल ए चमन से दूर रहता हूँ
कि हरदम देखता हूँ मैं गुलों के रूप में तुझ को
 
पुजारी और देवी देखने में हस्तियाँ दो हैं
मगर दोनों की रूहें एक हैं कैफ़ ए मुहब्बत में
नियाज़ ए इश्क़ ओ नाज़ ए हुस्न यूँ तो मस्तियाँ दो हैं
मगर दिल पर असर है एक दोनों का हक़ीक़त में
 
ये तकमील ए जुनूँ है, हासिल ए सद बेक़रारी है
पुजारी है कभी देवी, कभी देवी पुजारी है