भारत की संस्कृति के लिए... भाषा की उन्नति के लिए... साहित्य के प्रसार के लिए

"धड़कनों के बीच कस्तूरी लिए / राजेश शर्मा" के अवतरणों में अंतर

Kavita Kosh से
यहाँ जाएँ: भ्रमण, खोज
 
पंक्ति 12: पंक्ति 12:
 
   
 
   
 
ज़िन्दगी ने सीखलीं भरना कुलांचें,
 
ज़िन्दगी ने सीखलीं भरना कुलांचें,
मान नहीं करता कि अब इतिहास बाँचें.
+
मन नहीं करता कि अब इतिहास बाँचें.
 
घुंघरुओं में बांधकर चारों दिशाएँ,
 
घुंघरुओं में बांधकर चारों दिशाएँ,
 
हम बिना सुर-ताल के निर्बाध नाचें.
 
हम बिना सुर-ताल के निर्बाध नाचें.

17:54, 9 अप्रैल 2012 के समय का अवतरण


धड़कनों के बीच कस्तूरी लिए ,
प्रश्न ये है गंध को कैसे जियें ,
अब किसी आनंद को कैसे जियें,
 
ज़िन्दगी ने सीखलीं भरना कुलांचें,
मन नहीं करता कि अब इतिहास बाँचें.
घुंघरुओं में बांधकर चारों दिशाएँ,
हम बिना सुर-ताल के निर्बाध नाचें.
 
जब अकेले ही विचरने हृदय हो,
झुण्ड के अनुबंध को कैसे जियें.
 
एक भटके लक्ष्य पर,सौ-सौ शिकारी,
हर शिकारी की हवाओं पर सवारी.
जब नहीं हो पेड़- पौधा शेष कोई,
तब बचेगी ज़िन्दगी कैसे हमारी.
 
फूल ओढ़े आवरण पर आवरण हैं ,
प्रस्फुटित मकरंद को कैसे जियें.
 
हम नहीं हें सिर्फ, इकलौते अभागे,
जो बहारों के शिखर से कूद भागे.
और भी हैं , बंधुवर, मेरे तुम्हारे ,
जो रहे हैं दौड़ में हरबार आगे.
 
रास्ते पहुचे कसैली खाइयों में ,
चिर-रसीले छंद को कैसे जियें