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धुन्ध जी पुछु, रोशिनी विसिरी वई / एम. कमल

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धुन्ध जी पुछु, रोशिनी विसिरी वई।
उम्र याद आ, ज़िंदगी विसिरी वई॥

कहिड़े वण जी छांव झंगल में वणी,
शहरु याद आ, घरु घिटी विसिरी वई।

ऐ सितमगर वक्त, तो हीउ छा कयो!
दिलबरनि खां दिलबरी विसिरी वई॥

दरिया दिल यारनि जी हइ, जादूगरी।
रुञ न विसिरी, तश्नगी विसिरी वई॥

शोख़ रुख़ हो, खू़न पर पंहिंजो हुओ।
रतु न विसिरियो, बेरुख़ी विसिरी वई॥

जंहिं मिट्टीअ जी बूइ आ हॾ-मास में।
मुंहिंजे रत खां सा मिट्टी विसिरी वई॥