भारतीय साहित्य के विशालतम ऑनलाइन संग्रहालय से कुछ आंकड़े (...और गिनती जारी है!)
कविता कोश: 57000+ कुल पन्नें; 2,000+ रचनाकार; 25,000+ कविताएँ; 10,000+ ग़ज़लें; 3,000+ गीत/नवगीत; 1,500+ नज़्में | 125,000+ आगंतुक/माह; 20,000,00+ रचना-पठन/माह
गद्य कोश: 7,000+ कुल पन्नें; 500+ रचनाकार; 1,500+ कहानियाँ; 600+ लघुकथाएँ; 100+ उपन्यास; 600+ आलेख; 300+ निबंध; | 20,000+ आगंतुक/माह; 1,000,00+ रचना-पठन/माह
नगर प्रवेश / नन्दल हितैषी
Kavita Kosh से
| मुखपृष्ठ » | रचनाकारों की सूची » | रचनाकार: नन्दल हितैषी | » संग्रह: बेहतर आदमी के लिए |
जब तुम आते हो
सड़क के दोनो किनारे
पार दी जाती है, चूने की कतार,
देखते ही देखते
चौड़ी हो जाती हैं सड़कें.
रातों रात लग जाते हैं पैबन्द,
जिससे तुम्हें हचका न लगे,
कहीं सरक न जाये हूक.
कहीं हिल न जाय पेट का पानी
रातोंरात चटक हो उठते हैं
सड़क के ज़ेब्रे,
कुछ अधिक ’फ़ुर्त;/ हो जाते हैं चौराहे
और सीटियों के अन्तराल में
होने लगती है कंजूसी.
सिर्फ़ घुड़कते हैं लाल साफे
जब तुम आते हो
शहर में बरपा होता है/एक हंगामा
होती है कोई सड़क विशेष
तुम्हारे लिये
.... और तुम आम से खास हो जाते हो
सर्र ऽ ऽ हो जाते हो
तुम्हारे काफ़िले में
सबसे पीछे होती है फायर ब्रिगेड की गाड़ी
जब जब तुम आते हो
शहर में आग लगती है
तुम आग लगाने आते हो?