भारत की संस्कृति के लिए... भाषा की उन्नति के लिए... साहित्य के प्रसार के लिए
लोक संगीत
कविता कोश विशेष क्यों है?
कविता कोश परिवार

"नदी और मैं : एक प्रेम-कथा / कुबेरनाथ राय" के अवतरणों में अंतर

Kavita Kosh से
यहाँ जाएँ: भ्रमण, खोज
('{{KKGlobal}} {{KKRachna |रचनाकार=कुबेरनाथ राय |अनुवादक= |संग्रह=कं...' के साथ नया पृष्ठ बनाया)
 
(कोई अंतर नहीं)

11:26, 18 सितम्बर 2019 के समय का अवतरण

[नदी प्रतीक है त्रिकालव्यापी व्यक्ति चैतन्य के प्रवाह की। इसी व्यक्ति चैतन्य के भीतर लोकचैतन्य (कलेक्टिव कांशसनेस) भी प्रतिष्ठित है, ठीक वैसे ही जैसे व्यक्तिदेह के भीतर कूटस्थ अचल विश्वसत्ता प्रकाशित है। अत: जो मेरी नदी है वह सर्वव्यापिनी भी है। और मेरा भोग, मेरा आस्वादन, वास्तव में एक प्रीतिभोज है, सारे समूह के भोग और आस्वादन से जुड़ा हुआ। यदि उस बाहर की नदी के साथ भीतर की नदी का जो वस्तुतः एक चैतन्य प्रवाह के दो रूप है योग-संयोग निबिड़तर और अधिक अनुभव-संवेद्य हो उठे तो मेरा सम्पूर्ण जीवन ही सारी सृष्टि के लिए एक प्रीतिभोज बन जायगा। पर ऐसा होना बड़ा कठिन है। यह असाध्य साधना है। यही तो बुद्धत्व है। इसी को निर्वाण कहते हैं। (कु. ना. रा.)]

प्रस्तावना

मैं उस अनामा नदी के तट पर
बार बार जाऊँगा
जहाँ जरठ काले महीरुहों की छाँह में
तह पर तह शीतल शान्ति है, सुरक्षा है
जहाँ चलती है मन्द-मन्द, पके जामुन की
गन्ध से लदी मीठी काषाय हवा
जहाँ नदी के प्रवाह की अविराम कटि भंगिमा है
जहाँ अनवरत प्रवाहमान संकोचहीन प्रतीक्षा है
जहाँ यहाँ से वहाँ तक सर्वत्र व्याप्त है
एक अविभाजित अभुक्त काषाय क्षण का स्वाद
(मेरी प्रतीक्षा में, केवल मेरी प्रतीक्षा में!)
उसी अनामा नदी के तट पर
आज
कल
सदैव, बारबार जाऊँगा।
जहाँ घनी झमार पत्र-राशि के बीच
सरस परिपक्व गूदेदार गुच्छ के गुच्छ
लटके हैं रूप के रस के गन्ध के,
जहाँ मन चाभता है सद्य ताजे स्वादिष्ट प्राण,
जहाँ दूर अति दूर कोई दुर्विनीत शब्द
सघन वन गर्भ में टूटती शाखा सा चटखता है
फिर उधर ही कहीं, किसी गहरे गम्भीर में, डूबता-डूबता
उसी ओर कहीं अतल लीन हो जाता है
जहाँ कोई लीला हिल्लोलित शोख क्षण
क्रीड़ावश या लोभवश तट से आ टकराता है
और,
नरम ऊँगलियों से कठोर कगार का दृढ़ मन टटोल जाता है
फिर, प्रवाह समर्पित हो विनीत बह जाता है
एक बार भी घूमकर देखता नहीं।
चला ही जाता है विनीत और नतशीश
किसी सजल, अनन्त और व्यापक हृदय के पास।
मैं इन शोख दुर्विनीत क्षणों की विनीत इच्छाओं का
खेल देखने आज, कल
सदैव और बार-बार
उस अनामा नदी के तट पर जाऊँगा।

दृष्टि अभिसार

वह दिवस अद्भुद रहा, वह धूलिधूसर सांझ
दिन भर बेंत वन के मध्य, क्षीण कटि,
वैतसी तनु-भार, चन्दन-खौरी
साजती, अनिमेष लोचन ताकती
कोमल नरम वपु श्यामली,
एक वह कोई नदी।
और, मैं मानस-मुकुल को भूनता
सृष्टि को निष्कर्म सिद्धि बाँटता
काष्ठमौनी सिद्धियों का पीता रहा काषाय।
(कटु काषाय पर ही स्वाद जल का मिष्ट होता है!)
पर वह दिवस अद्भुद रहा, वह धूलिधूसर सांझ
हृदय में, कण्ठ में, देह में, मन में
सर्वभक्षी तृषा ले जब एक संध्या
बेंतवन के मध्य क्षीण कटि चंचल
वैतसी तनुभार, सांध्य चन्दन खौरि
आंकती, अनिसेष लोचन ताकती
एक वह कोई नदी तनुश्यामली।
मैंने उसे देखा,
मैंने नदी की दृष्टि को देखा,
क्षण दृष्टि वह, पर बन गयी अभिसार
पीने लगी मेरे सहज अस्तित्व को
नदी की अम्बुश्यामल दृष्टि वह!
मुझको लगा, तब, यह नदी है
प्रेयसी का भाल, अथवा दिशा-निर्देश
प्रभु की तर्जनी का, लक्ष्य है यह,
चरम परिणति है हमारी, मुक्ति है-गति है।
नयन पल्लव मुँद गये मेरे विकल विह्वल।
तो यह नदी देगी मुझे
अविराम गति की वेदना
औ' मुक्ति का सुख स्वाद!
नयन पल्लव मुँद गये मेरे
निःशब्द मैंने प्रार्थना की-
ओ नदी, तू जाग; तू प्रवाहित हो
कण्ठ में, मन में, देह में सर्वत्र
अनवरत, कर मुझे तू पान, छककर,
जिससे पा सकूँ मैं
अविराम गति की वेदना औ' मुक्ति का सुख स्वाद

राग

मुझ पर गुजर जाती है प्रति आधी रात
एक कोई सर्वभक्षी नदी
अनजाने आदिम जल की अकूल
सर्वभक्षी नदी।
मेरी शय्या के अगल बगल असंख्य
गुलाब और केतकी के दुर्गम झोंप,
असंख्य मणि सर्पों के निवास,
अनेक-अनेक पुतुल खेल, कोमल,
कूलद्रुम दृढ़ और बेपरवाह; सबको
सब कुछ को डुबाती यह सर्वग्रासी नदी
पता नहीं
आती कहाँ से और कहाँ चली जाती है।
प्रति आधीरात!
आदिम जल की सर्वभक्षी नदी!
पर ज्यों ही सुबह होती है
भास्वर वारिधार, नदी एक ज्योति:सरा
अवतरण करती है मुझपर, नदी पवित्र पापहरा।
तब न शय्या है, न शवाधार, न संशय।
यह दृश्यावली और है, यह दर्पण अन्य है,
स्पष्ट चेहरे हैं विराग और राग,
फिर-फिर नजरों के इशारे इत्यादि इत्यादि,
प्रेम पत्र, डांट-फटकार, ताजे समाचार
सरल आकृतियाँ, मनीआर्डर-तार
हम और यह सम्पूर्ण दृश्यावली हमारी
मलमल नदी स्नान करते हैं, प्रति प्रात
प्रसन्न मन, देहतल पोंछ पोंछ, फिर-फिर स्नान करते हैं।
प्रति सुबह नित्य जब यह उतरती है
भास्वर वारिधार, नदी पापहरा!
रात भर हा हा-रव शववाही धारा प्रवाहमान;
पर सुबह-सुबह, सब कुछ निर्मल है
झिर झिर ज्योतिर्मय, भास्वर प्रसन्न जल।
हे नदी, हे तामसी शववाही, हे भास्वर वारिधार!
तुझे शत शत नमन, तुझे बहुत बहुत प्यार।

समागम

नदी यह जानी पहचानी
अन्तर्वाहिनी, आपाद मस्तक बह रही ऐसे
मानो अंगांग लिपटी हो प्रेमिका की देह।
परस्पर थर थराते हृदय दो
रक्त की वह तीव्र वेग पछाड़
आपाद मस्तक बह रही उन्माद विद्युतधार
सुखद है यह मिथुन पीड़ा, मोहवंशी
बज रही, सुख-सर्वस्व है रतिसार
मन लिप्त-मूर्छित, रुद्ध हैं सब शेष रव,
रुक गये दिक् काल, शेष सृष्टि असार,
लौचन-स्नायुओं के मूल से उठते हुए
ब्रह्मरंध्र कपाल तक, चेतना के
सुखद दंशन, 'शॉक' और प्रवाह।
सुख-सर्वस्व है, यह रति-क्रिया, एकान्त
अह, चक्षु मेरे मुँद गये सुख स्नात।
कुछ क्षण बाद
आँखें खोलता हूँ, देखता हूँ
सुन्दर धरामुख, सृष्टि सुन्दर
सुन्दर यामिनी, तारिका-शृंगार,
सुन्दर गृहों के बन्द द्वार गवाक्ष
सुन्दर चाँदनी की रात निर्जन
धरती, कुसुमिता-वनकानना
सभी सुन्दर-विशुद्ध-पवित्र।
मुझ परम दरिद्र को यह महा अनुभव दान
कर गयी जो नदी
आपाद मस्तक बह रही है जो नदी
वह नदी मेरी यार, मेरी प्रेमिका है।
नदी, तेरे भाल पर चुम्बन, तुझको बहुत सा प्यार।

महाभाव

यह नदी अन्तर्वासिनी आपाद मस्तक बह रही।
कर रही मेरा निरन्तर पान,
पी रही मुझको निरन्तर यह नदी!
वाम-दक्षिण बाहु-पग, नयन युग के मध्य
गुल्फ त्रिकुटी बीच, स्नायु मण्डल-मध्य
सींचती, शिश्न-नाभि-ललाट
कर रही मुझको निरन्तर तृप्त,
कर रही मेरा निरन्तर पान।
आह, यह कैसी तृषा मेरी और उसकी भूख
देह भीतर, प्राण मन के मध्य
गुरु ने, पिता ने, प्रेमिकाओं ने
जो लगाये थे सघन कान्तार
अथवा पुष्पवन
सर्प संकुल केतकी वन
या कुसुम-संकुल झाड़-विहार-वीथी कुंज
नदी इन सबके मध्य अन्तर्धान
निरन्तर बह रही है, कर रही है तृप्त!
उनको कराती पान, उनका कर रही है पान!
यह नदी चिर संगिनी!
ओ नदी मेरी प्रिया, ओ नदी मेरी द्वितीया,
नदी मेरी यार, मेरी पुनः पुनः पुनर्जन्म!
यह परस्पर-पान ही है जन्म-धारण की
खेचरी-बज्रौलिका, पाँचवाँ पुरुषार्थ अथवा मुक्ति!
इसी से बार बार आना है ओ नदी,
ओ अनामा, ओ नदी, तेरे तट बार बार आना है!

साधारणीकरण

नदी, तू निमंत्रण बांट जाती है।
नदी, तू निमंत्रण की पाती है!
मेरे मन में जटिल-वरारोह देशकाल व्यापी,
महा महीरुह सहस्र वर्ष वृद्ध,
नदी, तू उसी की निमंत्रण-पाती है।
उसी के किसी चिरंजीवि-श्रीमान पौत्र-प्रपौत्र की
जन्म-द्वादशी अथवा विवाह-व्रतवन्ध की
हल्दी-अभिषिक्त एक स्वति श्री निमंत्रण पाती है
जिसे कल कल ध्वनि से तू सर्वत्र बाँट आती है,
अपने को बूंद-बूंद काट-काट सर्वत्र बाँट आती है।
नदी, स्वयं तू निमंत्रण की पाती है।
मिलते हैं बन्धु से बन्धु गले
जाता उल्लास रव दूर के गाँव तक
हँसी की वर्षा, मुस्कान पहचान की
काका और दादा, भइया और बचवा
उमड़ी है जवार; सभी भाई है
सभी परस्पर दृढ़ दाहिनी बाँह है।
('भइयारे बिराना, तब भी दहिन बाँह!]
षट रस स्वाद की बहार, दही-शक्कर।
कुल्हड़ पर कुल्हड़, पात्र पर पात्र
'वाह भाई वाह', 'दो, इन्हें और दो',
'लो भाई, लो', 'वाह भाई वाह!'
जुड़ता है प्रीतिभोज गाँव में
वीरोचित रोमांचक पंक्तिभोज
पाँत हँकड़ती है, खाती है, तृप्त डकारती है,
षट रस की होती है वर्षा, बजती है
अह, सुख और तृप्ति की बाँसुरी।
वह जो मेरे संस्कारों में हजार वर्ष व्यापी
महामहीरुह है वही इस समूचे ग्राम के
हजार हजार वर्षों के स्थावर संस्कारों का
'उर्ध्वमूलं अधोशाखा' विग्रह है,
उस वृद्ध महीरुह में नये मुकुल लगते हैं
वृद्ध तरु-जटाजूट लहलहा उठता है
आनन्द इसके पत्ते हैं, तृप्ति है फूल
और प्राण हैं लाल लाल गोदे,
मधुर और रसाल।
(दो सुपर्ण इसकी डाल पर बैठे हैं!
एक है दर्शक उपवासी और अन्य सरसफल का भोक्ता है।)
नदी तू स्वयं ही
मेरी उदार धरा, वत्सला भूमि की
मेरे मन में अतिष्ठ महावृद्ध
उर्ध्वमूल-अधोशाखा पीपल की
हल्दी-अभिषिक्त निमंत्रण-पाती है!
ओ नदी, तू इस बार जाकर जन जन से
वे जन-जन जो मेरे ही अस्तित्व के
विभिन्न टुकड़े हैं, जयमल-शुकदेव से
जितेन्द्र से, मंगला से, रामसागर से
शोभा से, एब्राहम और अजीज से-
सबसे जन-जन से जाकर कहना तुम :
'स्वति श्री सर्व उपमा योग्य बड़े को
प्रणाम और छोटों को हार्दिक आशीष'
ओ जन्मान्तर-सहगामिनी चेतन अस्तित्व की,
अस्मिता की, त्रिकाल व्यापी व्यक्तिचित्त की,
साथ ही मेरे, अपने, निजी लोकचित्त की नदी!
ओ, नदी, ओ जन्मान्तर-प्रवाह,
तू स्वयं में एक निमंत्रण की पाती है
अविच्छिन्न प्रीतिभोज की निमंत्रण पाती है।

उपसंहार


दूर कहीं दूर, कहीं पर
किसी एक दिन जुड़ता है पर्व संक्रान्ति का
जुटती है भारी भीड़- झारी-कमण्डलु,
दूब और अक्षत, दीप और पार्थिव
तट पर बिखरे हैं या प्रवाह को अर्पित हैं।
'ओ री मुन्नी, गहरे में मत जा'
'ओ टंकू, जल में दंगा नहीं करते हैं।'
'वाह री भाभी, पीती हो डूब डूब,
कहाँ ऐसा सीखा धार में सन्तार काटना?'
(भाभी की देह गोरी मछली है यार!
भाभी नदी कन्या है, गुदाज और स्वादिष्ट!)
'सब्र करो न, बैशाख तो आता ही है!'
(ओह, हल्दी और लग्न का माधवमास!)
'भाभी तेरा मुंह है अनूपम वाटिका
फूल जो झड़ते हैं मौसम-बेमौसम'
(मन कहता है : देह है अनूपम वाटिका!)
इधर इस प्रकार सस्वाद चलते हैं, उधर उस ओर।
भीगे वस्त्र, कम्पित गात सूर्योन्मुख कोई
अंजलि समर्पित कर रही, नयन मूंद;
विगलित करुणा चेहरे पर झलक गयी;
फिर कुछ पुष्प दल गिरे नदी की धार में।
मैं देखता हूँ उस पार से प्रवाहिता
आ रहीं फूलों की पाँत पर पाँत
सार्थक है श्रम जल सरयूदास का
धन्य हैं उनका फूल वन, उनकी कुटी
और धन्य है यह गंगातट, गायों के ढारे
अरहर के झाड़, वन तुलसी के झोंप
खट्टी झड़बेरी के जंगल भी धन्य हैं,
शूकर, चित्रमृग, साँप और शृगाल
दौड़ते हिरन और कूजते चक्रवाक
ढेकीं की पाँत और सारस की वलाका।
धन्य है बाबा सरयूदास का परिवार।
दिन में, बाबा सरयूदास मधुकरी
माँग खाते हैं और फूल उगाते हैं
रात को श्वापदों के बीच किसी अन्तर की
अनामा नदी को 'योगवाशिष्ट' के
श्लोक बोल बोल कर सुलाते हैं
देते हैं श्लोकों की थपकी, कहते हैं;
'नदी, अब तू बस कर, अब तू मत रो,
ओ मेरी रानी, ओ मेरी फल्गु, सो जा!'
'नदी, अब तू सो जा!'
तो भाई मेरे, जान ले तू भी असल बात
एक ही वह नदी है जो बहती सर्वत्र
मुन्नी में, टंकू में, भाभी में, दादी में
मुझमें और तुझमें वही है जो
बाबा सरयूदास में फल्गु बन जाती है,
हाँ, हाँ, वही एक ही सर्वव्यापी अतः सलिला है
अरे वही है बुद्ध की निर्मल निरञ्जना भी।
वही बाहर और भीतर, सर्वत्र, सबको
परस्पर जोड़ती है, परस्पर बाँटती है,
वही भगवती सुरेश्वरी भागीरथी बनती है
और तट पर संक्रान्ति पर्व जुड़ता है।
पर जन जन के भीतर भिन्न नाम, भिन्न रूप,
निर्मल निरञ्जना या मरुस्रोता फल्गु
अनामिका यमुना या लुप्तस्रोत सरस्वती
या और कुछ बनती है, पर नदी है
एक, अखण्ड, व्यक्ति के सामूहिक चित्त की।
पात्र-पात्र में सिमट कर भिन्न भिन्न
नाम रूप लेती है, जन्म प्रति जन्म
हमारी व्यक्ति-सत्ता की अस्मिता की
वाहिका बनी हुई आमरण साथ चलती है
अतीत और अनागत के जन्मों का
गर्म बीज धारण किए हुए यह नदी
जन्म प्रति जन्म नखशिख बहती है
इसी से कहता हूँ, नदी, तुम मेरी द्वितीय स्वयं।
नदी, तुम वान्धवी, प्रेमिका, माता
नदी, तुम देवता,
तुम्हें बार-बार नमन
तुम्हें बहुत-बहुत प्यार!