भारत की संस्कृति के लिए... भाषा की उन्नति के लिए... साहित्य के प्रसार के लिए
लोक संगीत
कविता कोश विशेष क्यों है?
कविता कोश परिवार

"निरभ्र नभ / रामेश्वर काम्बोज ‘हिमांशु’" के अवतरणों में अंतर

Kavita Kosh से
यहाँ जाएँ: भ्रमण, खोज
पंक्ति 36: पंक्ति 36:
 
तुम लाख रौंदना
 
तुम लाख रौंदना
 
फिर उग आएँगे।
 
फिर उग आएँगे।
 +
<poem>

00:04, 24 अगस्त 2019 का अवतरण

33
निरभ्र नभ
शैलशृंग चूमते
प्रतीक्षातुर
दो घूँट मिल जाएँ
तो तपन बुझाएँ ।
34
मोती- सा मन
बरसों था सँभाला
पीस ही डाला
कुछ निपट अंधे,
अकर्ण साथ बँधे।
35
काई -सी छँटी
अपनों की भीड़ भी
छूटा नीड़ भी
एक तेरा आँचल
एकमात्र सम्बल।
36
तोड़ने चले
जीवन के घरौंदे
ज्वार -से उठे
पैरों तले रौंदने
खुद ही मिट गए।
37
चले जाएँगे,
याद यह रखना
अंकुर हम
तुम लाख रौंदना
फिर उग आएँगे।