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निरभ्र नभ / रामेश्वर काम्बोज ‘हिमांशु’

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33
निरभ्र नभ
शैलशृंग चूमते
प्रतीक्षातुर
दो घूँट मिल जाएँ
तो तपन बुझाएँ ।
34
मोती- सा मन
बरसों था सँभाला
पीस ही डाला
कुछ निपट अंधे,
अकर्ण साथ बँधे।
35
काई -सी छँटी
अपनों की भीड़ भी
छूटा नीड़ भी
एक तेरा आँचल
एकमात्र सम्बल।
36
तोड़ने चले
जीवन के घरौंदे
ज्वार -से उठे
पैरों तले रौंदने
खुद ही मिट गए।
37
चले जाएँगे,
याद यह रखना
अंकुर हम
तुम लाख रौंदना
फिर उग आएँगे।