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निर्बीज से क्यों हो चले हम / सोम ठाकुर

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इस तरह निर्बीज -से
क्यो हो चले हम आज
हरियल घास पर बैठे हुए

कहाँ हैं अंकुर हमारे
तने - शाखें
ध्वंस बोलो पर सहमकर
टिकी आँखें
तृप्ति का कैसा समंदर हम तरेंगे
मारुथलों की प्यास पर बैठे हुए

शोक मुद्राएँ
सुबह को दी किसी ने
शाम को दुर्दांत हलचल दी
गाल पर मलने चले थे
रंग -लाल गुलाल
लेकिन राख मल दी
किस लहू की कंडरा में चल पड़े
अरदास पर बैठे हुए
हरियल घास पर बैठे हुए