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नींद की मछलियां खेलतीं धार पर / केदारनाथ मिश्र ‘प्रभात’

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स्वप्न-शैवाल से कुछ निकलतीं उधर
कुछ मचलतीं वहां, कुछ बिछलतीं इधर
कुछ अतल को हिलोरें किरण-पुच्छ से

कुछ दीये-सी जलें शुक्ति-शृंगार पर
कुछ चपल-रश्मियों से उभरती चलें
दूधियां चांदनी में संवरती चलें
सुप्त संज्ञा जहां कौंधती कुछ वहां

कौंधतीं बिजलियां ज्यों हवा-तार पर
कुछ रहीं चुन समय के झड़े पंख जो
कुछ रहीं चुन सितारों-जड़ें पंख जो
बीच जल के गिरे जो अचल लड़खड़ा

कुछ उछालें उन्हें चक्षु-पतवार पर
नींद की मछलियां खेलतीं धार पर