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नींद है, ख़्वाब है, हक़ीक़त है / मदन मोहन दानिश

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नींद है, ख्वाब है, हक़ीक़त है ।
और किस चीज़ की ज़रूरत है ।

गुफ़्तगू क्या हुई परिंदों मे,
शाख़ समझी नहीं, गनीमत है ।

चिठ्ठियों के जवाब लिख डालूँ,
आज कुछ तल्खियों से फ़ुरसत है ।

इत्तेफ़ाकन मिले थे हम लेकिन
अब जो बिछड़े तो बस क़यामत है ।

ये जो सामान है मेरे घर मे
मेरी ख़्वाहिश नहीं, ज़रूरत है ।

ये ख़ुशी भी है क्या ख़ुशी दानिश,
ये भी एक शख़्स की अमानत है ।