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न्याय / विजय चोरमारे / टीकम शेखावत

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किसने हटा दी है
पट्टी
न्यायदेवता के आँखों पर से
और बाँध दी है
न्यायाधीश की आँखों पर?

क्या डर नहीं बिलकुल
न्यायालय की अवमानना का?

जब दलितों के घर जलाए गए
तब
गाँव की बिजली गुल हो गई थी
आग लगाने वालों के चेहरे नहीं पहचान सका कोई भी
परिणाम स्वरूप,
बिना ठोस सबूतों के
छूट गए सभी निर्दोष!

क्या ये भी मान लें,
पकड़े गए लोगों के हाथों से
मिटटी के तेल की गंध नहीं आई
घर जलाए गए थे यह तो सच है ना?

घर नहीं जलाए गए तो फिर
जो जला था वह दरअसल
क्या था?
और कैसे लगी थी आग?

जवाब का इन्तज़ार करना होगा...
तब तक

पट्टी रहने दीजिये न्यायाधीश की ही आँखों पर!
न्यायालय की न हो जाए अवमानना
कम से कम इसलिए कोई घर तो नहीं जलाएगा!

मूल मराठी से अनुवाद — टीकम शेखावत