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पटाक्षेप के बाद / अनुराधा सिंह

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मैं इस समय की उपज
जब बोलने के लिए पूरे वाक्यों का इस्तेमाल
गैरजिम्मेदारी और अश्लीलता है
एक पूरी कविता लिखने का जोखिम उठाती हूँ अक्सर.
बेस्ट सेलर्स में ढूंढती हूँ
पटाक्षेप के बाद की कहानी

तीन चौथाई सदी पहले पंद्रह साल की ऐन फ्रैंक
भूख बीमारी और घुटन से लड़ते हुए मारी जा चुकी है
गांधी ने पता नहीं क्यों ‘हे राम’ कहा था
उन्हीं दिनों

मेरी बेटी ने दो रातों एक दिन के भीतर
‘द डायरी ऑफ़ अ यंग गर्ल’ पढ़ डाली है
ऐसे ही पढ़ी थी उसने एक बार महात्मा गाँधी की आत्मकथा
और तब से हलकान कर रखा है उसे
महारानी के भारत और हिटलर के जर्मनी ने
इसी बीच होलोकॉस्ट के दौरान भूख से मार दिए गए
यहूदी बच्चे की छोटी सी जैकेट
अमरीका के संग्रहालय में सजाने को सौंप दी गयी है
मेरे शहर की मजदूर सड़कों के बदन में गड्ढे पड़ गए हैं

बाक़ी सड़कें हैं अजगर की छाती सी काहिल चिकनी
गौरी नाम की औरत ने दक्षिण मुंबई की शीशे सी चमकती
गंगा के पाट सी चौड़ी सड़कें नहीं देखीं
जबकि ३४ साल पहले शहर की आंबेडकर चाल में
दत्तात्रेय जाधव के घर जन्मी थी व

नहीं पाती हूँ
मेरी बेटी के लिए ऐसी एक किताब
जिसमें डेढ़ महीने के बच्चे की मौत पर
यहूदी माँ बाप का विलाप लिखा हो
या यह कि बर्तन घिसती गौरी का
दक्षिण मुंबई की एक सड़क को न देख पाना भी
होलोकॉस्ट का ही हिस्सा है