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परिचय / महेन्द्र भटनागर

स्नेह की मधु-धार हूँ मैं !

पास जो आये न मेरे,
दूर का परिचय रखा बस,
भावना से हीन समझा
की उपेक्षा व्यंग्य से हँस,

जान पाये वे भला कब
प्रेम-पारावार हूँ मैं !

देह निर्बल देखकर जो
एक उड़ती-सी नज़र से,
फेरकर मुख, हो गये उस
क्षण अलग मेरी डगर से,

जान पाये वे भला कब
शक्ति का संसार हूँ मैं !

मुसकराया मैं न किंचित;
क्योंकि था अति क्षुब्ध-जीवन,
इसलिये जो लोग मुझको
हैं समझते मूक पाहन,

जान पाये वे भला कब
बीन की झंकार हूँ मैं !

कूल ही पर छोड़ मुझको
चल पड़े जो नाव लेकर,
ज्वार-लहरों में गये फँस,
अब गरजता सिंधु जिन पर,

जान पाये वे भला कब
मुक्ति की पतवार हूँ मैं !