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पर्व / राजकिशोर सिंह

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आता है पर्व
गरीबों के लिए
चिढ़ाता है पर्व
गरीबों को
इठलाता है पर्व
गरीबों को
रहता है याद
गरीबों को पर्व
रहता है स्मरण
स्वाद पकवानों का
पर्व में पिफर
आती है याद
कर्ज की
पर्व में पिफर
लेता है कर्ज
महाजनों से
पर्व में
बिकती है जमीन
महाजनों के हाथ


पर्व में
लुटता है जीवन
इसी दर्द में
पर्व में
ध्नवानों की
आती है याद
पर्व की विकृतियाँ
कुकृत्य संस्कृतियाँ
कहीं दारू की जंग
कहीं जुए की उमंग
या
किसी को लुभाने की सौगात
दिऽाने को अपनी औकात
या पिफर
मिटाने को बस्ती
दिऽाने को अपनी हस्ती।