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पहली बार विरह के तीव्र शोक की दु:खिनी / कालिदास

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 आश्‍वास्‍यैवं प्रथमविरहोदग्रशोकां सखीं ते
     शैलादाशु त्रिनयनवृषोत्‍खातकूटान्निवृत:।
साभिज्ञानप्रहितकुशलैस्‍तद्वचोभिर्ममापि
     प्रात: कुन्‍दप्रसवशिथिलं जीवितं धारयेथा:।।

पहली बार विरह के तीव्र शोक की दु:खिनी
उस अपनी प्रिय सखी को धीरज देना।
फिर उस कैलास पर्वत से, जिसकी चोटी
पर शिव का नन्‍दी ढूसा मारकर खेल करता
है, तुम शीघ्र लौट आना। और गूढ़ पहचान
के साथ उसके द्वारा भेजे गए कुशल सन्‍देश
से मेरे सुकुमार जीवन को भी, जो प्रात:काल
के कुन्‍द पुष्‍प की तरह शिथिल हो गया है,
ढाढ़स देना।